आज के दौर में भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो बिना जानकारी के सिर्फ सुनी सुनाई बातों पर भरोसा कर लेते हैं। और इसके चलते वो बहोत बड़ी गलफहमी का शिकार हो जाते हैं। और अगर इस गलफहमी को कोई दूर नहीं करेगा तो वह गलतफमी ज़िन्दगी भर के लिए दिमाग़ में पलती रहेगी। इसलिए ज़रूरी है की ऐसी सुनी सुनाई बातों को छोड़ कर हम खुद उस चीज़ के बारे में पढ़ें, ताकि हमें उस चीज़ का सही ज्ञान हो। तो आज हम कुछ ऐसी की गलतफहमियों के बारे में आपको बताएँगे, जो की सुनी सुनाई बातों के कारण पैदा हुई हैं।
काफिरों को मारने का हुक्म
कुछ लोगों का ऐसा मानना है की मुसलमान अपने अलावा दूसरे धर्म के लोगों को काफिर मानते हैं, और काफिरों को क़ुरान में मारने का हुक्म आया है। ऐसे लोग क़ुरान की सूरह तौबा की आयत नंबर ५ का हवाला देते हैं। अगर देखा जाए तो ये हवाला अधूरा है। क्यूंकि की केवल एक आयत से पूरी बात समझी ही नहीं जा सकती है। यह तो बिलकुल ऐसा हो गया की अगर कोई भाषण दे रहा हो और 'कहे की भारत कभी विकसित नहीं हो सकता' और हम उसको देशद्रोही कह दें क्यूंकि यह तो भारत की बुराई हुई। जबकि उसने आगे ये कहा 'भारत कभी विकसित नहीं हो सकता जब तक यहां जातिवाद और भ्रष्टाचार रहेगा। हमने आधी बात सुन कर इससे कितना अलग तर्क निकाल लिया। या कोई ये कहे की ' सबको जान से मार देना चाहिए' हम इतना ही सुनकर उस व्यक्ति को कट्टर औरआतंकवादी कह दें तो ये भी अधूरा ज्ञान होगा जबकि उसने कहा की 'सबको जान से मार देना चाहिए जो भी महिलाओ के साथ कुछ गलत करे'
कुछ ऐसा ही हाल है सूरह तौबा की उस पांचवीं आयत का हम इसके आगे या पीछे की आयतों को पढ़ते ही नहीं।
अगर हम इसके आगे और पीछे की आयतों को पढ़ें तो मालूम होगा की किन मुशरिकों को मरने का हुक्म दिया जा रहा है।
जी हाँ पूरी सूरह पढ़ने पे पता चलता है की, यहां कुछ ऐसे मुशरिकों के बारे में बात हो रही है जो मदीने में रहते थे, और मुसलमानों के खिलाफ मंसूबे बनाते थे, मुसलमानो के क़त्ल की साज़िशे रचते थे और बहरी दुश्मनों से मिलकर पैग़म्बर मुहम्मद को क़त्ल करने की ताक में लगे रहते थे।
तो सूरह तौबा में इन्हीं को मारने का हुक्म है, हालाँकि आयात नंबर २ में ये साफ़ है की पहले इनको सुधरने का मौका दो, अगर ये अपनी हरकतों से बाज़ आजाते हैं तो इनके साथ वफ़ा करो, जैसा की चौथी में आयत है की, उन मुश्रिकीन को छोड़ दो जिनका तुम्हारे साथ अनुबंध है, 'इस बात को लेकर की वो चैन सुकून और अमन से मदीने में रहेंगे' और कॉन्ट्रैक्ट निभाने में तुम्हारे साथ कोई कमी नहीं की और ना ही तुम्हारे खिलाफ किसी की मदद की तो ऐसे लोगों के साथ तुम भी एक मुद्दत तक वफ़ा करो, क्यूंकि अल्लाह अच्छे लोगों को पसंद करता है।
इसी तरह छटवीं आयत में देखें तो, यहां पर भी साफ़ लिखा है, 'और अगर मुश्रिकीन में से कोई व्यक्ति पनाह मांग कर तुम्हारे पास आना चाहे तो उसे पनाह दे दो यहां तक की वह अल्लाह का कलाम सुन ले फिर उसे उस जगह छोड़ आओ जहाँ वो रहता है, ये इसलिए करना चाहिए क्यूंकि इन लोगों को कम ज्ञान होता है।
और इसी तरह दसवीं आयत में है की 'किसी मोमिन (believers) के मामले में ना यह लोग रिश्ते का लिहाज़ करते हैं ना किसी वादे की ज़िम्मेदारी का और ज़्यादती हमेशा उन्ही की तरफ से होती है। इन आयतों से साफ़ पता चल रहा की कुछ ऐसे असामाजिक तत्त्व मदीने में मौजूद थे जो माहौल ख़राब कर रहे थे और उन्हीं को मारने का हुक्म दिया गया है, जबकि पहले कई महीने की सुधरने की मुहलत दी गयी थी, अब ज़ाहर सी बात है ऐसे लोग अगर आज भी किसी देश में होंगे तो उनकी पूजा तो की नहीं जायेगी।
एक से अधिक विवाह का हुक्म
बहुत से लोग ऐसा जानते हैं की इस्लाम में एक से ज़्यादा पत्नी रखने का हुक्म है, और सभी मुसलमान एक से अधिक बीवियां रखते हैं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है, इस्लाम में चार शादियों की इजाज़त है हुक्म नहीं है, वो भी इस शर्त के साथ की तीनों पत्नियों के साथ बराबर इन्साफ कर सके तो नहीं तो एक ही करे और यही बेहतरीन होगा।
अगर आप चाहें तो सूरह निसा की आयत नंबर १-३ पढ़ें।
मांस खाने का हुक्म
बहुत लोगों को ऐसा लगता है की इस्लाम में अलग, अलग जानवरों के मांस खाने का हुक्म दिया गया है। जबकि ऐसा नहीं है, कुछ जानवरों को हलाल कहा गया है, मतलब ये मुसलमान के अख्तियार में है, चाहे वो खाये या न खाये, और बहुत से ऐसे भी मुसलिम होते हैं जो मांस खाना पसंद नहीं करते। अब कुछ लोग कहेंगे की मांस खाना हलाल क्यों किया?
अरब के रेगिस्तानी इलाके में साग सब्ज़ी की खपत जितनी उपज नहीं हो सकती।
और भी इसकी कई वजहें हैं जैसे इको बैलेंस सिस्टम। जिसकी कभी विस्तार से चर्चा होगी, हालाँकि अपने पेट को क़ब्रिस्तान बनाना भी ठीक नहीं है, जैसा की ये खुद धर्म ग्रंथो में है।
दुसरे धर्मों के प्रति नफरत की भावना
जो लोग ऐसा सोचते हैं की इस्लाम दूसरों धर्मो के प्रति नफरत की शिक्षा देता है, तो वो लोग पैग़म्बर मुहम्मद के जीवन के बारे में पढ़ें, की किस तरह से गैर मुस्लिम भी उनको सादिक़ और अमीन कहते थे यानी सच्चा और ईमानदार, क़ुरान में है की दूसरों के खुदाओं को बुरा न कहो।
जो चीज़ आपको पढ़ने से मिल जायेगी वो सुनी सुनाई बातों से कहीं ठोस और मान्य होंगी।

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