यह था भारत के इतिहास का पहला नेशनल हाईवे, जिसका वाजपेयी सरकार में फिर से हुआ था नामकरण


आज से 500 साल पहले शेर शाह सूरी के राज में भारत ने पहली बार "नेशनल हाईवे" जैसा कुछ जाना। एक सड़क जो तब कोलकाता, सासाराम, कानपुर, अमृतसर, लाहौर होते हुए ढाका से पेशावर जाती थी उसे सड़क-ए-आज़म (The great road) कहा गया। इस सड़क के किनारे पेड़ लगवाए गए और यात्रियों के आराम के लिए सराय (rest house) बनवाये गए। मुग़लो ने इस सड़क को पूरब में चिटगांव तक और पश्चिम में काबुल तक बढ़ाया। अंग्रेज़ों ने इसे और विस्तृत करके जी.टी. रोड (Grand Trunk Road) की शक्ल दी।


सदियों पहले पूरब और दक्षिण से उत्तर की तरफ चलने वाले क़ाफ़िलों की सहूलत के लिए मुग़लों ने बनारस के नज़दीक कई सराय बनवाये जहां लोग रातों को ठहरते थे। उनकी सुविधा और सुरक्षा का इंतेज़ाम मुग़लों के ज़िम्मे होता था। लोगों ने इस जगह को मुग़लों के सम्मान में "मुग़लसराय" नाम दिया। सदियों यात्रियों का पड़ाव रहे मुग़लसराय से आज वो सारी रेलवे लाइन भी गुज़रती है जो दक्षिण-पूर्वी भारत को पश्चिम-उत्तर भारत से जोड़ती है। और स्टेशन का नाम है मुग़लसराय जंक्शन।
अब योगी आदित्यनाथ की सरकार मुग़लसराय स्टेशन का नाम बदल कर किसी संघी के नाम पर रख रही है। मगर योगी आदित्यनाथ को ये नहीं मालूम की महानता किसी लकीर को मिटाने में नहीं, बल्कि उसके नीचे उससे बड़ी नयी लकीर खींचने में है। महानता तो तब होती जब योगी मुग़लों का एक प्रतिशत भी कर पाते। नाम तो कोई भी बदल सकता है। उसमे क्या रखा है? मगर इसका कुछ हासिल नहीं है।


इसलिए, मित्रों,
कुछ बड़ा करवाये योगी-मोदी वग़ैरा से। क्योंकि ये जो मुसलमानों की निशानियाँ मिटाने का भूत सर पर सवार हुआ है ना, ये मुमकिन ही नहीं है.
जीटी रोड को मिटानें का काम तो अटल बिहारी बाजपेई सरकार में ही पूरा हो गया था. जब स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में जीटी रोड के टुकड़े करके नया हाई-वे बना दिया गया. इससे पहले भी कांग्रेस ने गुपचुप तरीके से जीटी रोड को ज़मीन पर ना सही क़ाग़ज़ पर दो हिस्सों में बांट दिया था. दिल्ली से अमृतसर की तरफ़ NH-1 कहलाता था और दिल्ली से कलकत्ता की तरफ़ NH-2 , बाद में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के क्रियान्वयन में जीटी रोड के कई टुकड़े करके NH-2 में शामिल कर के कुछ को उस परियोजना का हिस्सा बना दिया गया और पुराने जीटी रोड के कुछ हिस्से उनके हाल पर छोड़ दिये गये. जिनमें से कुछ टुकड़ों को नये नामकरण के साथ विकसित किया जा रहा है.

हीनता ग्रन्थि से जूझते लोगों को ऐसी कोई महानता स्वीकार्य नहीं होती जिसके मूल में वह ना हों.
 ”जो क़ौम अपनी तारीख़ भूलती है, उसे दुनिया भुला देती है”

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