ऐसी प्रथा जिसमें लाशों को न दफनाया जाता है, न जलाया जाता है, यह किया जाता है लाशों के साथ


अभी तक आपको यह पता होगा कि जब कोई मनुष्य मर जाता है तो उसके शव को या तो दफना कर या फिर जलाकर उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है।

लेकिन हम आपको एक ऐसी प्रथा के बारे में बताएँगे जिसमें शव को न तो दफनाया जाता है और न ही जलाया जाता है। बल्कि शव को पहाड़ों की चोटियों पर रख दिया जाता है, जिससे वह शव या तो सड़ कर ख़त्म हो जाता है या फिर उसको मुर्दाखोर पक्षी खा कर ख़त्म कर देते हैं। इस प्रक्रिया को 'आकाश दफ़न' कहा जाता है, जिसमें मृत शरीर को दफनाने और जलाने के बजाय पहाड़ों पर रख दिया जाता है और इस प्रकार वह मृत शरीर आकाश के नीचे गल कर ख़त्म हो जाता है या पक्षियों द्वारा खा कर ख़त्म कर दिया जाता है।

आकाश दफन चीनी प्रांतों और तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्रों में जैसे क्विंघाई, सिचुआन और, साथ ही साथ मंगोलिया, भूटान औरभारत के सिक्किम और जांस्कर जैसे हिस्सों में भी प्रचलित है।

अधिकांश तिब्बती लोग और कई मंगोल वज्रयान बौद्ध धर्म का पालन करते हैं, जो आत्माओं के प्रवास की शिक्षा देता है। यह प्रथा भी वज्रयान बौद्ध की परंपरा का हिस्सा समझी जाती है। इनके अनुसार मरने के बाद शरीर को संरक्षित करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह अब एक खाली पात्र है। और अब इसमें कोई चीज़ मौजूद नहीं है। इसलिए अब पक्षी इसे खा सकते हैं या प्रकृति इसे विघटित कर सकती है।

आकाश दफन का कारण यह भी बनता है कि तिब्बत की ज़मीन बहुत सख्त और पथरीली है, जिसको खोदना बहुत मुश्किल काम होता है, क्यूंकि ज़मीन खोदने पर चट्टान निकल आती है। इसलिए शवों को दफनाया नहीं जा सकता है। शवों को जलाने के लिए वहां लकड़ी और पेड़ पौधे भी बहुत कम हैं जिसकी वजह से शवों को जलाया भी नहीं जा सकता है। इसलिए वहाँ के लोग मृत शरीर को आकाश दफन करते हैं।

तो यह दो बड़े कारण हैं 'आकाश दफन' के प्रचलित होने के एक तो ज़मीन का ठोस और कठोर होना, और ईंधन और लकड़ी की कमी होना।

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