इस्लाम में पत्नीयों को कितने अधिकार दिए जाते हैं? इसकी पूरी सच्चाई जानने के लिए पढ़ें


जब भी हम पत्नियों के अधिकारों के बात करते हैं तो इससे हमारा तात्पर्य महिलाओं के अधिकारों के बारे में होता है। आज के समय में आप महिला सशक्तिकरण के बारे में खूब सुनते होंगे। महिला सशक्तिकरण को लेकर खूब बड़े बड़े आंदोलन दुनिया भर में किये जा रहे हैं। लेकिन अगर वास्तव में हमें महिलाओं को सशक्त बनाना है, तो हमें किसी प्रकार के आंदोलन की आवश्यकता नहीं है हमें केवल महिलाओं को उनके अधिकारों से जागरूक कराना की ज़रूरत है। और महिलाओं को उनके अधिकारों को दिलाने की ज़रूरत है जिनका हम अब तक हनन करते आये हैं।
हर समाज में महिलाओं को एक अलग दर्जा और एक अलग स्थान प्राप्त होता है।
दोस्तों जब भी हम महिलाओं के अधिकारों को किसी भी धर्म से जोड़ कर देखते हैं, तो हमें पता चलता है कि हर धर्म ने अपने अपने हिसाब से महिलाओं के अधिकारों का वर्णन किया है। दुनिया के हर धर्म ने महिलाओं और पुरुषों के अधिकारों और उनके कर्तव्यों का अपने अपने अनुसार वर्णन किया है।
हम किसी धर्म की बात न करते हुए हम आपको बताएँगे कि इस्लाम में एक पत्नी को क्या क्या अधिकार मिले हैं जो उसके पति के लिए अनिवार्य हैं कि अपनी पत्नी को वह सभी अधिकार दे।
  • इस्लाम के अनुसार पति पर अनिवार्य होता है कि वह अपनी पत्नी की सभी वित्तीय ज़रूरतों को पूरा करे, यह इस्लाम में पत्नी को अधिकार मिला है।
  • पत्नी का पूरा खर्च पति को पूरा करना ज़रूरी है।
  • पति घर का कोई काम अपनी पत्नी से नहीं करवा सकता है, जैसे खाने बनाना इत्यादि लेकिन अगर पत्नी अपनी मर्ज़ी से करे तो कोई बात नहीं है।
  • पति अपना कोई काम पत्नी से नहीं करवा सकता है।
  • बच्चों की देख भाल और पालन पोषण की ज़िम्मेदारी पति की होती है, अगर पत्नी चाहे तो बच्चे की देख भाल के लिए पति से मुआवज़ा भी ले सकती है।
  • पत्नी की कमाई पर पति का कोई अधिकार नहीं होता है।
  • इस्लाम के अनुसार पति को अपनी पत्नी की महर की रक़म अदा करना ज़रूरी है।

तो यह थे कुछ विशेष अधिकार को इस्लाम में पत्नियों को दिए जाते हैं। इसके अलावा भी पत्नियों को बहुत से अधिकार मिले हैं, लेकिन यह उनमें से कुछ मुख्य अधिकार थे जो हमने आपको बताएं हैं।
आज के समय में हम सब उल्टा होते हुए देख रहे हैं, जहाँ मर्द अपनी ज़िम्मेदरियों से पीछा छुड़ाते दिख रहे हैं, तो वहीं औरतें न केवल घर संभालती हैं बल्कि वह सारी ज़िम्मेदारियाँ भी निभाती हुई नज़र आती हैं जिनको निभाना एक पुरुष का अधिकार था।
यह महिलाओं के अधिकारों का हनन नहीं है तो क्या है कि जहाँ औरतें अपनी पूरी ज़िम्मेदारियाँ खुद ही उठाती हैं। अगर हमने महिलाओं के अधिकारों को न छीना होता तो आज हमें किसी प्रकार के नारीवाद जैसे आंदोलन की ज़रुरत न पड़ती।

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