किसानों को भड़काने के पीछे किसका हाथ है?

मध्य प्रदेश में चल रहा किसानों का आंदोलन इस मंगलवार को हिंसक हो गया. खबरों के मुताबिक उपज के वाज़िब दाम और कर्ज़ माफी की मांगों पर सरकार से उचित आश्वासन न मिलने से नाराज़ किसानों ने मंदसौर ज़िले के दलौदा में भारी पथराव और तोड़-फोड़ की. हालात काबू में लाने के लिए सुरक्षा बलों को गाेलियां चलानी पड़ीं. इसमें पांच किसानों की मौत हो गई. हालांकि स्थानीय अख़बारों ने छह मौतों की ख़बर दी है.

हालात की समीक्षा के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चाैहान ने मंगलवार देर शाम आपात बैठक बुलाई. इसके बाद उन्होंने ऐलान किया कि इसकी न्यायिक जांच कराई जाएगी कि गोलियां आख़िर चलाईं किसने? उन्होंने मारे गए किसानों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपए का मुआवज़ा देने का भी ऐलान किया. इससे पहले सोमवार को मुख्यमंत्री ने कहा था, ‘जो लोग प्रदर्शन कर रहे हैं वे किसान नहीं हैं. कुछ असामाजिक तत्व सक्रिय हैं. पुलिस उनसे सख़्ती से निपटेगी.’

फिर जब मंगलवार को पुलिस की गोलियों से किसानों की मौत की ख़बर आई तो प्रदेश के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह और मंदसौर जिले की प्रभारी मंत्री अर्चना चिटनीस ने भी इसी तरह के बयान दिए. इन मंत्रियों ने कहा, ‘गोलियां पुलिस ने नहीं चलाई हैं. बल्कि उसने बीते छह दिनों के दौरान जबर्दस्त संयम बरता है. लेकिन कुछ असामाजिक तत्व आंदोलन के नाम पर शुरू से ही हिंसा पर उतारू हैं.’ भूपेंद्र सिंह ने विपक्ष पर भी आरोप लगा दिया कि वह ‘पर्दे के पीछे से हिंसा भड़का रहा है.’ ऐसे में इस घटना पर राजनीतिक रंग चढ़ना भी लाज़िमी ही था और वह चढ़ भी चुका है. सत्याग्रह को मिली जानकारी के मुताबिक आंदोलन की अगुवाई कर रहे एक अन्य संगठन-राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ ने इस घटना के विरोध में बुधवार को प्रदेशव्यापी बंद आयोजित किया. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने इस बंद को पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की.

शुरुआत कैसे हुई?

आंदोलन की शुरुआत एक जून को हुई थी. अपनी 13 सूत्रीय मांगों को लेकर राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ, आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) से जुड़े भारतीय किसान संघ और तीन अन्य किसान संगठनों ने मिलकर यह आंदोलन शुरू किया था. हालांकि पांच जून को आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों से बातचीत के बाद मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि सरकार आठ रुपए प्रति किलो की दर से किसानों से प्याज ख़रीदेगी. उन्होंने यह भी कहा कि दालें वग़ैरह भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदी जाएंगी और साथ ही कृषि उपज की ख़रीद के लिए 1,000 करोड़ रुपए का स्थायी कोष भी बनाया जाएगा. इसके बाद भारतीय किसान संघ ने आंदोलन ख़त्म करने का एलान कर दिया.

लेकिन आंदोलन में शामिल अन्य संगठनों ने कहा कि सरकार ने 13 में दो प्रमुख मांगें तो मानी ही नहीं हैं. इनमें एक किसानों पर चढ़ चुके करीब 39,000 करोड़ रुपए का कर्ज़ माफ करने की है और दूसरी कृषि उत्पादों के लिए लाभकारी मूल्य व्यवस्था स्थापित करने से ताल्लुक रखती है. ये आरोप भी लगे कि सरकार और भारतीय किसान संघ के नेताओं के बीच साठगांठ हो गई है. इससे राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ और दूसरे किसान संगठन भड़क गए. उन्होंने भारतीय किसान संघ द्वारा आंदोलन से पीछे हटने के फैसले को ‘किसानों के साथ धोखा’ करार दिया और घोषणा कर दी कि जब तक दोनों प्रमुख मांगें नहीं मानी जातीं, आंदोलन ज़ारी रहेगा.

‘असामाजिक तत्व’ आख़िर हैं कौन?

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनके मंत्री आंदोलन में हुई हिंसा के पीछे ‘असामाजिक तत्वों’ का हाथ बता रहे हैं. सो यह सवाल उठना लाज़मी ही है कि उनका इशारा आख़िर किस तरफ है. जानकारों के मुताबिक इसका ज़वाब अप्रैल-मई 2011 में हुए ऐसे ही आंदोलन, हिंसा और उससे जुड़े किरदारों में छिपा हो सकता है. तब भारतीय किसान संघ के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा ‘कक्का जी’ की अगुवाई में इसी तरह का आंदोलन खड़ा किया गया था. उस आंदोलन के दौरान एक रोज़ लाखों किसान अचानक राजधानी भोपाल में जुट आए थे और किसी को भनक तक नहीं लगने पाई थी. पूरी सरकार इस आैचक धावा बोल से सकते में आ गई थी.

राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष त्रिलोक गोठी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘इस बार की तरह सरकार ने तब भी किसानों का दमन किया था. उस दौरान सात मई को राजधानी के पास ही बरेली कस्बे में किसानों पर एके-47 से गाेलियां चलाई गई थीं. इसमें एक किसान की मौत हुई थी. राज्य के इतिहास में पहली बार प्रदर्शनकारी किसानों पर पुलिस ने एके-47 का इस्तेमाल किया था.’ उस आंदोलन के बाद ‘कक्का जी’ भारतीय किसान संघ और आरएसएस से बाहर कर दिए गए. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ बना लिया जिसके वे अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

जानकारों की मानें तो 2011 के उस वाक़ये के बाद से ही शिवकुमार शर्मा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच खटास बनी हुई है. शायद इसीलिए इस बार जब मुख्यमंत्री ने आंदोलनकारी किसान संगठनों से बातचीत की पहल की तो शिवकुमार शर्मा को नहीं बुलाया. सिर्फ भारतीय किसान संघ के प्रतिनिधियों से बातचीत कर के छुट्‌टी पा ली. ख़बरों के मुताबिक शिवकुमार शर्मा और उनके समर्थक इसी से नाराज़ थे. क्योंकि इन लोगों को लगता है कि किसानों के बीच उनका जनाधार प्रदेश में अन्य किसी भी संगठन से ज़्यादा है. शर्मा ने मीडिया से बातचीत में कहा भी, ‘सरकार ने अगर सभी किसान संगठनों के प्रतिनिधिय से बातचीत की हाेती तो हालात इतने न बिगड़ते.’

मध्य प्रदेश जैसा ही हाल महाराष्ट्र में है

यही हाल महाराष्ट्र में है. वहां भी करीब एक हफ्ते से किसानों का आंदोलन चल रहा है. मध्य प्रदेश की तरह मुख्य मांगें वहां भी दो ही हैं. पहली- किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने का इंतज़ाम किया जाए. दूसरी- किसानों का कर्ज़ माफ कर दिया जाए.

मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने मंगलवार को मीडिया से बातचीत के दौरान इसका ऐलान भी कर दिया. उनका कहना था, ‘राज्य सरकार किसानों का कर्ज़ माफ करने को तैयार है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि महाराष्ट्र के इतिहास में यह सबसे बड़ी कर्ज़ माफी होगी. इस सिलसिले में शासन के स्तर पर विचार-विमर्श चल रहा है. पांच एकड़ से कम ज़मीन वाले सभी किसान इस कर्ज़ माफी के दायरे में आएंगे. इस कर्ज़ माफी का ऐलान अक्टूबर तक कर दिया जाएगा.’

लेकिन मुख्यमंत्री की इस घोषणा के बाद भी आंदोलन बदस्तूर जारी है. ख़बरों के मुताबिक इसी मंगलवार को किसानों ने कोल्हापुर और नासिक में राजस्व अधिकारियों के कई दफ़्तरों पर ताले जड़ दिए. अहमदनगर में संभागीय आयुक्त और अमरावती में जिला कलेक्टर के दफ्तर के बाहर सब्जियां फेंक दीं. नासिक, धुले, जलगांव आदि में कई वाहनों पर पथराव किए जाने की भी ख़बरें आई हैं.

आंदोलन थमते न देख मुख्यमंत्री फड़णवीस ने मामले में एक नया कोण जोड़ दिया है. काफी कुछ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ही तर्ज़ पर उन्होंने कहा है, ‘आंदोलन को हवा देने वाले किसान नहीं हैं. ये राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता हैं. किसानों की समस्याओं से राजनीतिक लाभ उठाने वाले लोग हैं. इनसे राज्य सरकार कोई बातचीत नहीं करेगी. सिर्फ सच्चे किसानों से ही बातचीत की जाएगी.’

लेकिन देखिए, यहां भी राजनीतिक लाभ उठा कौन रहा है?

मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठा कोई व्यक्ति बयान दे तो उसके अर्थ निकाले ही जाएंगे. सो, मध्य प्रदेश की तरह महाराष्ट्र के मामले में भी मुख्यमंत्री के बयान के पीछे छिपे निहितार्थ समझने की कोशिश की गई. सो पता चला कि यहां भी भाजपा के ‘अपने’ ही लोग हैं जो कथित रूप से ‘राजनीतिक लाभ’ उठा रहे हैं. इनमें पहला नाम है- शिवसेना जिसका सहयोगी संगठन ‘किसान क्रांति मोर्चा’ आंदोलन को पूरा सहयोग और समर्थन दे रहा है. जबकि दूसरा नाम आता है- स्वाभिमानी शेतकरी संगठन (एसएसएस) का. पुलिस ने सांगली और अमरावती में एसएसएस के करीब 26 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया है.

शिवसेना और एसएसएस दोनों इस वक्त फडणवीस सरकार में साझीदार हैं. एसएसएस तो पिछला विधानसभा चुनाव भी भाजपा के साथ मिलकर लड़ी थी. शिवसेना भी भाजपा से 25 साल पुराना गठबंधन तोड़कर चुनाव में उतरी भले अलग थी लेकिन सरकार गठन के वक्त फिर उसके साथ आ गई थी. वह सिर्फ राज्य में ही नहीं केंद्र भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में साझीदार है. यानी यह वह गठजोड़ है जो बीते ढाई-तीन दशक से तमाम मतभेदों के बावज़ूद एक परिवार की तरह कायम है.

हालांकि अब जैसी कि ख़बरें आ रही हैं मुख्यमंत्री फड़णवीस अपने इस परिवार में बंटवारा चाहते हैं. सीधे शब्दों में कहें तो वे विधानसभा के मध्यावधि चुनाव कराने की इच्छा रखते हैं. इस सिलसिले में आगामी 17 जून काे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से भी बातचीत की जा सकती है. शाह उस दौरान तीन दिन तक मुंबई में रहेंगे. इस बाबत भाजपा के एक पदाधिकारी टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहते भी हैं, ‘हमारे पास दो विकल्प हैं. पहला- कांग्रेस, एनसीपी (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) या शिवसेना से कुछ विधायक तोड़कर बहुमत जुटा लिया जाए. दूसरा- मध्यावधि चुनाव में उतरा जाए. पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ता दूसरे विकल्प के पक्ष में हैं.’

लेकिन सवाल उठता है कि क्या फड़णवीस को तब भी विरोध-प्रतिरोध के इस सिलसिले से निज़ात मिल जाएगी. इस सिलसिले में महाराष्ट्र भाजपा के सामने सामने मध्य प्रदेश एक मिसाल हो सकता है जहां सुनी-सुनाई टाइप की एक और दिलचस्प ख़बर इन दिनों राज्य के राजनीतिक हलकों में तैर रही है. इसके मुताबिक शिवराज सिंह सरकार के एक कद्दावर मंत्री इन दिनों इसलिए परेशान हैं कि उन्हें विपक्ष की तरह आंदोलन बुलंद करने का मौका नहीं मिल रहा है. लिहाज़ा वे सरकार से हटने पर विचार कर रहे हैं ताकि बरसों तक विपक्षी-प्रतिपक्षी बने रहने की अपनी आदत के मुताबिक फिर सरकार की नाक में नकेल डाल सकें.

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