भारत, धर्म और पाखंडों की भक्ति

इन्सान जब दुनिया में आया था तो उसके पास आज के जैसे जिवन यापन के कोई खास साधन नहीं थे। और जीवन बड़ा कठिन और सख्त था अनेक परेशानियां एवं कठिनाईयां थीं। शायद वह कठिनाईयां आज के समय में झेलने के लायक नहीं थीं। उस समय बिमारी थी इलाज नहीं था परेशानी थी हल नहीं था सर्दी गरमी और बरसात से बचने के लिए छत नहीं थी। मीलों का सफर पैदल करना पड़ता था और भी सैंकड़ों परेशानियों से घिरा हुआ जीवन था । हालांकि तब भी इन्सान के अन्दर ऐसी क्षमता और शक्ति थी कि वह आज के जैसे साधनों को प्राप्त कर सके और आज के जैसे अनेक आविष्कार करके जीवन को आसान बना सके। और जो शक्ति उसके अंदर थी जिसने उसको अविष्कार और साधन पैदा करने के सक्षम बनाया वह थी उसकी बुद्धि और सूझ बूझ जो उसमें पहले भी थी। लेकिन उसका इस्तेमाल करना उसने धीरे धीरे सीखा और आज अपनी इसी सूझ बूझ के कारण इन्सान घण्टों में कई मील का सफर तय कर लेता है मीलों दूर बैठे अपने चाहने वालों से बातें कर लेता। घर बैठे दुनिया की खबरें पता कर लेता है। धरती से चांद और चांद से मंगल तक पहुंच जाता है यह सब उसकी बुद्धि का ही तो कमाल है और उसकी सूझ बूझ की देन है। जिससे वह आज इतनी आसान जिन्दगी जी रहा है।

धर्म कैसे अस्तित्व में आया?

अब सवाल यह पैदा होता है कि अगर इन्सान बीतते समय के साथ अपनी परेशानियों का हल खुद ही निकालता जा रहा है तो उसे किसी भगवान की क्या जरूरत है? इन्सान के जीवन में सुख और दुख दोनों होते हैं। बेशक इन्सान अपनी सूझ बूझ के सहारे अनेक परेशानियों का हल निकाल सकता है और उनका डट कर मुकाबला भी कर सकता है। लेकिन कुछ परेशानियां ऐसी हैं जिसका हल ढूंढ पाना उसके हाथ में नहीं है। और इसी कारण इन्सान एक ऐसी दैवीय शक्ति को ढूंढने लगा जिससे वह अपने सारे दुख बांट सके और अपनी परेशानियां सुना सके। जिससे वह दैवीय शक्ति बेबस इन्सान की परेशानियों को दूर कर सके। आज के समय में तो सांइस इतनी तरक्की और विकास कर चुका है कि ईश्वर, भगवान और अल्लाह जैसी दैवीय शक्ति को मानता ही नहीं है। और बहुत से लोग कम्युनिस्ट विचारधारा का भी पालन करने लगे हैं। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि जबसे इन्सान तरक्की की राह पर चल पड़ा है कोई नया धर्म अस्तित्व में नहीं आया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस तरक्की के इस समय में लोगों को ईश्वर जैसी दैवीय शक्तियों में दिलचस्पी नहीं रही। यह सारे धर्म तब अस्तित्व में आएं हैं जब इन्सान का जीवन कठिनाइयों और दुखों से भरा हुआ था जब अविष्कार के नाम पर सूई तक नहीं थी। इन्सान के पास बुध्दि होते हुए उसका प्रयोग करना नहीं आया था। तब इन्सानों ने चांद सूर्य और पत्थर जैसी चीजों की पूजा करनी शुरू कर दी और इन्हीं को अपना देवता और ईश्वर समझ बैठे। इस प्रकार से अलग अलग धर्म अस्तित्व में आए।

हर धर्म के अपने अलग अलग ज्ञानी

धर्म अस्तित्व में आया तो उनके ज्ञानी और गुरुओं का वजूद में आना स्वाभाविक है। और इन गुरुओं ने अपने अपने धर्म के अलग अलग रीति रिवाज बना डाले जिससे इनके धर्म की पहचान हो सके। हर धर्म का अपना अलग पहनावा अपने अलग पूजा पाठ होने लगे। जहां बहुत से ऐसे भी धर्म थे जिनके गुरुओं ने इन्सानों को ऐसी शिक्षा दी जिससे वह वास्तव में इन्सान बन सके और ऐसे अनेक शास्त्र इन्सानों को प्रदान करे जिससे एक पुरूष महापुरुष बन सके। और यही नहीं किसी दौर में चर्च के अन्दर दर्शन, गणित, जीव विज्ञान पॉलिटिक्स तक की शिक्षा दी जाती थी। और ऐसे ही इस्लाम धर्म के अन्दर भी शिक्षा पर जोर दिया गया है और इनके गुरुओं ने भी मनुष्य को ज्ञान और शिक्षा से सम्मानित किया जिसके परिणामस्वरूप जाबिर इब्ने हय्यान जिनको यूरोप में जेबेर के नाम से जाना जाता है और बू अली सीना जैसी हस्तियां वुजूद में आईं। जाबिर को फादर अॉफ केमिस्ट्री भी कहा जाता है। इस्लाम के अलावा भारत के सबसे पुराने सनातन धर्म के बहुत से गुरुओं ने भी लोगों में शिक्षा और ज्ञान बांटा वैद दिया और योग एक बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा बौद्ध धर्म के गुरु ने हमें जड़ी बूटियों से इलाज का ज्ञान दिया और कराटे का ज्ञान दिया। एक तरह से हम कह सकते हैं कि हमारे शिक्षित होने के पीछे एक तरह से इन गुरुओं का भी योगदान रहा है।

फिर धर्म में पाखंड कैसे?

गुरुओं के अच्छे चरित्र और व्यवहार से लोग उनके भक्त या चेले हो जाते थे। धर्म गुरु उनको भगवान की पूजा के साथ ज्ञान और शिक्षा भी देते थे। लेकिन समय बदलता गया और लोग बदलते गए। अब धर्म का लिबास पहन कर कोई भी पाखंडी बाबा धर्म का प्रचार करने उठ जाता है धर्म और आस्था के नाम पर बुद्धिहीन लोगों को बहाता है। और ऐसे लोगों की भारत में कोई कमी नहीं है क्योंकि अगर ऐसे बुद्धिहीन लोग अगर न होते तो राम रहीम और आसाराम जैसे अरबपति अय्याश बाबाओं का वुजूद न होता। अब न तो लोग बाबाओं के चरित्र को देखते हैं ना ही उसके व्यवहार को लोगों को बस बाबा की भक्ति भा जाती है। अब ऐसे गुरु भगवान की पूजा करना नहीं सिखाते खुद ही भगवान बनने की चाह रखते हैं। अब गुरु शिक्षा या ज्ञान नहीं देता केवल अपनी ब्रांडिंग करता है। ऐसा पहले भी होता था लेकिन हम यह कह सकते हैं कि पहले का समय और था। लोगों को विश्वास और अंधविश्वास का अंतर नहीं पता था। लोग ज्यादातर अंधविश्वास को मानते थे। उनकी बुद्धि विकसित नहीं हुई थी सही गलत की अच्छी पहचान भी नहीं थी। लेकिन आज का समय उससे अलग है अबके लोग पढ़े लिखे हैं। आज के समय में लोग अंतरिक्ष में जिन्दगी जी रहे हैं चांद और मंगल पर जा रहे हैं। लेकिन अब भी बहुत से मोटी बुद्धि के लोग पाए जाते हैं जो इन पाखंडियों को भगवान समझ बैठते हैं। इनकी भक्ति में इतने लीन हो जाते हैं कि फिर इनको सही, गलत कुछ नहीं दिखता। दरअसल यह ऐसे अंधभक्त हो जाते हैं कि ना तो इनको कुछ दिखाई पड़ता है और न ही कुछ समझ आता है। हो सकता है कि आपके समझाने पर उन पर उल्टा असर हो। भक्ति किसी की भी हो आंख और दिमाग खोल कर होनी चाहिए। नहीं तो यह भक्ति बहुत खतरनाक हो सकती है आए दिन भक्तों द्वारा हिंसा की खबरें आती हैं। यह भक्त किसी के भी हो सकते हैं किसी बाबा के भी और किसी राजनेता के भी। उन ढोंगी बाबाओं और राजनेताओं से भी खतरनाक उनके भक्त होते हैं। क्योंकि इन भक्तों की पूरी बुद्धि भक्ति में चली जाती है। इसलिए इनको समझाने और हकीकत से आगाह कराने पर यह हिंसा पर उतर आते हैं। इसलिए बाबाओं और राजनेताओं को सजा देने के साथ साथ भक्तों को भी सजा होनी चाहिए क्योंकि इन्हीं भक्तों के कारण ऐसे बाबा या राजनेता पैदा होते हैं।

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