बढ़ती बलात्कार की घटनाओं का ज़िम्मेदार कौन ?


भले ही आज हमारे समाज में साक्षरता का स्तर बढ़ गया हो, भले ही आज हम अपने समाज को सभ्य समाज कहते हों, भले आज हमारी तार्किक शक्ति और सोचने समझने की सलाहियत दोगुनी होगी हो, भले ही आज हमारे समाज में आज़ादी से जीवन जीने को मौलिक अधिकार माना जाता हो। लेकिन कहीं न कहीं हमसे ऐसे गुनाह होते हैं, जो हमें अहसास दिलाते हैं कि हम तिरस्कार और पस्ती की ओर जा रहे हैं। कभी कभी ऐसा लगता है कि इंसानी समाज को जानवरों से शिक्षा लेने की ज़रुरत है। 
बलात्कार एक ऐसी बीमारी है जिसमे मर्द से खुद उसकी मर्दानगी हार जाती है। 

कुछ लोग मानते हैं की बलात्कार का कारण आज की फिल्में हैं, कुछ लोग मानते हैं की लड़कियों के कम कपड़े हैं। हालांकि ये दोनों ही कारण पूरी तरह से सही नहीं है। 
फिल्मों से हम बहुत कुछ सीखते हैं, और फिल्मों में दिखाई जाने वाली चीज़ों को हम अपनी असल ज़िन्दगी में ढूँढ़ते हैं,इस बात से कोई पूरी तरह इंकार नहीं कर सकता। अगर फ़िल्में सिर्फ एंटरटेन के लिए बनायीं जाती और इससे लोगों पर कोई असर न पड़ता तो ये कहना भी गलत होता की फलां फिल्म का मैसेज बहोत  अच्छा था। अगर ऐसा होता तो लोगों को प्रेरित करने के लिए किसी की जीवनी पर फिल्मे नहीं बनायीं जातीं या लोगो को जागरूक करने के लिए 'टॉयलेट एक प्रेम कथा' या पैडमैन जैसी फिल्मों का कोई मतलब नहीं बनता और भी सैकड़ों फ़िल्में हैं जैसे दंगल, चक दे इंडिया, और हाल ही में रिलीज़ हुई 'मुल्क ' फिल्म भी इसमें शामिल हैं। 
इसलिए हमें मानना ही पड़ेगा की फ़िल्में आपके असल जीवन पर प्रभाव डालती हैं। 
अब रही बात छोटे कपड़ों की तो यह बलात्कार के लिए आमंत्रित नहीं करते लेकिन यौन इच्छा को ज़रूर बढ़काते हैं। और इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता। और अगर ऐसा नहीं है तो मुझे नहीं पता की योन इच्छा क्या होती है ?
लेकिन हम इसको बलात्कार का कारण नहीं ठहरा सकते हैं। क्यूंकि यौन इच्छा का ज़िंदा होना कोई पाप नहीं है। बल्कि यौन इच्छा का होना तो स्वाभाविक और प्राकृतिक है। और इसका बलात्कार से कोई सम्बन्ध नहीं है। क्यूंकि बलात्कार एक घिनौना पाप है। 
हमें ज़रुरत किसी और को सुधारने की नहीं है, बल्कि खुद का सुधार करने की है। 
इन सबके अलावा सबसे ज़्यादा ज़रुरत किसी चीज़ की है तो बच्चों की अच्छी परवरिश की है। जहाँ हमें औरतों को सामान समझने के बजाये उनको सम्मान देने के बारे में समझाया जाए। सम्मान का मतलब ये नहीं है की हमको उनके चरणों में झुकना है, बस इतना काफी है की है उनको अपने औरत होने पर शर्म का एहसास न होने दें। बल्कि अपने जैसा इंसान समझें सामान नहीं। 

अब रही बात बलात्कार को रोकने की तो जो लोग औरतों को सामान समझते हों उनका सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। ऐसी फिल्मो का बहिष्कार होना चाहिए जिसमे औरतों के सम्मान को ठेस पहुंचाया गया हो। 
बलात्कारियों के लिए कठोर से कठोर क़ानून होना चाहिए जिससे दूसरों को सबक मिले और दिल में क़ानून का खौफ हो। 

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