देश प्रेम को लेकर हमेशा मुसलमानों को निशाना बनाया जाता है, और उनसे देश भक्ति का सबूत माँगा जाता है। कुछ लोगों को लगता है कि मुसलमान इस्लाम की शिक्षा के कारण अपने देश से प्रेम नहीं करते हैं। तो वहीं कुछ लोग समझते हैं कि इस्लाम में देश प्रेम की शिक्षा नहीं दी जाती है, इसलिए मुसलमान अपने धर्म को देश से ऊपर समझते हैं। हालांकि देखा जाये तो ऐसा केवल मुसलमानों में ही नहीं है। भारत के इतिहास से आपको पता चलेगा कि भारत में मुस्लिम शासकों से पहले इस देश का संविधान 'मनुस्मृति' हुआ करती थी। आपको बता दें कि मनुस्मृति हिन्दू धर्म ग्रंथों से पूरी तरह प्रभावित थी। इस प्रकार देखा जाए तो उस समय हिन्दू धर्म ही देश प्रेम था। और जैसा कि आज भी हिन्दू राष्ट्र की मांग कुछ हिन्दू संगठनों की तरफ से की जा रही है। अब आप खुद सोचिये कि इसमें देश को ऊपर रखा जा रहा है या देश को। बहरहाल हर धर्म अपने हिसाब से अपने धर्म वालों को देश प्रेम की शिक्षा देता है। यह कहना गलत होगा कि धर्म को ऊपर रखा जा रहा है देश को नीचे क्यूंकि धर्म ही देशप्रेम है इसीलिए शायद कुछ हिन्दू संगठन हिन्दू राष्ट्र की मांग कर रहे हैं।
अब रही बात इस्लाम कि देशप्रेम शिक्षा की तो पैग़म्बर मोहम्मद की हदीस है कि 'हुब्बुल वतने मीनल ईमान' यानी 'वतन से प्रेम ईमान का हिस्सा है' इसलिए आपने देखा होगा कि भारतीय मुस्लिम कभी कभी हज पर जाते हुए तिरंगा लेकर जाता है और वहां जाकर फहराता है।
यह हदीस उनके मुंह पर तमांचा है जो मुसलामानों से उनकी देशभक्ति का प्रमाणपत्र मांगते हैं।

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