इस्लाम की वह महान हस्ती, जिसकी हुकूमत में एक दिन भी कोई भूखा न सोया


हर समय में एक महान हस्ती होती है जिसको इतिहास भुला नहीं पाता है। इन महान हस्तियों की खूबियों, इनकी अच्छाइयों और इनके नेक चरित्र के कारण लोग इनकी तरफ आकर्षित होते हैं। और इनके दीवाने हो जाते हैं, कुछ तो इनकी महानता के इतने क़ायल हो जाते हैं कि इनको भगवान् मान बैठते हैं।
हम आपको इस्लाम की एक ऐसी ही हस्ती के बारे में बताएँगे, जिसकी खूबियों को देखकर कुछ लोग उन्हें ईश्वर मान बैठे।
अली इब्ने अबी तालिब का नाम पता नहीं आपने सुना होगा या नहीं। हज़रत अली शिया मुसलामानों के पहले इमाम और सुन्नी मुसलामानों के चौथे खलीफा हैं।
हज़रत अली का जन्म 15 सितम्बर सन. 601 ईस्वी को काबा में हुआ। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार 13 रजब सन. 30 आमुलफील को हज़रत अली का जन्म हुआ।
हज़रत अली पैग़म्बर मुहम्मद के चचेरे भाई और उनके दामाद थे। पैग़म्बर मुहम्मद के इस दुनिया से चले जाने के बाद मुसलामानों के तीन खलीफा गुज़रे हैं। जिनके बाद हज़रत अली को पैग़म्बर मुहम्मद का उत्तराधिकारी बनाया गया और उनको खिलाफत सौंपी गयी। हज़रत अली की हुकूमत कुल पांच साल रही और इस दौरान हज़रत ने कुरान और सुन्नत के अनुसार न्याय का शासन क़ायम किया।

हज़रत अली की नीतियाँ
भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और समतावादी नीतियां
हज़रत अली ने वित्तीय भ्रष्टाचार और अनुचित विशेषाधिकारों के खिलाफ एक असंगत अभियान की शपथ लिया। इस अभियान के कारण अभिजात वर्ग में उनकी अलोकप्रियता बढ़ गयी इसके बावजूद भी उन्होंने सुधारों को आगे बढ़ाने में अपने संकल्प से पीछा क़दम नहीं हटाया जिसके कारण , अमीर और पैगंबर के विशेषाधिकार प्राप्त पूर्व साथी हज़रत अली से दुश्मनी पर उतर आये।
हज़रत अली की हुकूमत आते ही सारे भ्रष्टाचारी अधिकारियों को उनके पद से हटा दिया गया। जिसकी वजह से हज़रत अली को काफी वरोध का सामना करना पड़ा। हज़रत अली ने पीड़ितों को इन्साफ दिलाया और गरीब को उनका हक़ दिलाया जो सालों से उससे वंचित थे।
हज़रत अली ने न खुद कभी हुकूमत का पैसा अपने लिए इस्तेमाल किया और न ही सरकारी अधिकारीयों को इस्तेमाल करने दिया। हज़रत अली ने अपने अधिकारीयों को सख्त हिदायत दे रखी थी कि सरकारी ख़ज़ाने से बिलकुल भी फ़िज़ूल खर्ची न हो।
इतिहासकार और खोजकर्ता बताते हैं कि हज़रत अली की पांच साल की हुकूमत में एक भी दिन कोई व्यक्ति भूका नहीं सोया। हज़रत अली ने अपने जीवनकाल में कूफ़े में पाए जाने वाले हर यतीम की परवरिश और ज़िम्मेदारी ली है। हज़रत अली के जीते जी किसी भी यतीम को यतीम होने का अहसास नहीं हुआ। और जब हज़रत अली को नमाज़ के सजदे के दौरान अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम ने उनकी गर्दन पर तलवार चला दी। हज़रत अली इससे बहुत ज़्यादा चोट आयी हकीम ने कहा की जितना हो सके इनको दूध पिलाया जाये। उस समय कूफ़े के गलियों गलियों में यतीम बच्चों के हाथों में दूध के प्याले थे और वह दूध हज़रत अली को पिलाना चाहते थे। हज़रत अली की शहादत से कूफ़े की गलियों गलियों में 'हाय अली' की आवजें बुलंद थीं।

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