जब भी हम प्रकृति की ओर नज़र उठा कर देखते हैं हमें बहुत से ऐसे जंतु, जंतु मिलते हैं जिनके बारे में हम सोचते हैं कि इनके होने से भला क्या फ़ायदा? हम सोचते हैं कि इनका प्रकृति के संरक्षण के लिए क्या योगदान है? सांप भी उन जीवों में से है जिनके बारे में हम सोचते हैं कि इनके होने से प्रकृति और इंसानों को क्या फ़ायदा होता है?
दूसरी तरफ हमें यह भी बताया जाता है कि प्रकृति या ईश्वर ने किसी भी चीज़ को फालतू या बेकार नहीं बनाया है। आज के 1400 साल पहले यही सवाल एक गैर मुस्लिम ने हज़रत अली से पूछा था।
एक बार एक ग़ैर मुस्लिम हज़रत अली के पास आया और हंस हंस कर कहने लगा " या अली आप ज्ञान के द्वार हैं और आप कहते हैं कि अल्लाह ने हर चीज़ को किसी न किसी मक़सद के लिए पैदा किया है"। "उसमें इंसान का फ़ायदा होता है, लेकिन मुझे बताइये यह डसने और जान लेने वाला सांप जगह-जगह फिरता रहता है इसमें भला क्या फ़ायदा है"?
बस इतना कहना था कि इमाम अली ने नज़रें उठाई और उस व्यक्ति की ओर देखते हुए कहा "अल्लाह अपनी बनाई हुई हर चीज़ से प्रेम करता है, अफ़सोस तो यह है कि अल्लाह जितना इंसानों पर मेहरबान है इंसान उतना ही उसकी मेहरबानियों से बेखबर हैं"।
"ऐ शख्स अल्लाह ने सांप के मुंह में ज़हर इसलिए रखा ताकि सांप ज़ोर ज़ोर से अपने मुंह से हवा निकाले और उस हवा की वजह से पर्यावरण में जितनी ऐसी बीमारियां जन्म लेती हैं, जो इंसानों के हानि का कारण बनती हैं वह सभी बीमारियां ख़त्म हो जाएँ"।
"ऐ शख्स याद रखना इंसान के वजूद में कुछ ऐसी बीमारियां जन्म लेती हैं, जिसका इलाज अल्लाह ने सांप के ज़हर में रखा है"।
"अफ़सोस तो यह है कि इंसान सिर्फ वही जानता है जो वह जानना चाहता है"।
इस प्रकार से हज़रत अली ने उस व्यक्ति को समझाया कि ईश्वर या अल्लाह ने सांप को क्यों पैदा किया और उसको होने से इंसानों को क्या फ़ायदा है।

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