इस्लाम में औरतों को मस्जिद में जाने का अधिकार क्यों नहीं है? इसकी सच्चाई जानना है तो पढ़ें


इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसमें केवल एक ही ईश्वर की पूजा की जाती है। इस्लामी मान्यताओं के अनुसार ईश्वर निराकार है क्यूंकि ईश्वर ने हमें आकर और रूप दिया जिससे हम कल्पना करने लगे कि ईश्वर भी हमारे ही जैसा होगा। जबकि ईश्वर तो इससे कहीं महान जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।
हमारी सोच और हमारा विचार सीमित है, इसलिए हम जितना चाहते हैं और जो चाहते हैं केवल वही सोच और समझ पाते हैं।
इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसमें ईश्वर के अलावा किसी भी चीज़ की पूजा नहीं की जा सकती है। इस्लाम में मूर्ति पूजा की अनुमति है और न ही किसी व्यक्ति की पूजा की जा सकती है।
चूँकि इस्लामी मान्यताओं के अल्लाह या ईश्वर निराकार है और उसका अस्तित्व कहीं सीमित नहीं है वह हर जगह मौजूद है। ईश्वर या अल्लाह किसी समय या जगह में सीमित नहीं है वह हर पल हर जगह मौजूद है।
इसलिए अल्लाह की इबादत या पूजा किसी एक स्थान के लिए विशिष्ट नहीं है, बल्कि ईश्वर की पूजा कभी भी कहीं भी की जा सकती है। कुछ लोग अगर यह समझते हैं कि नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिद ज़रूरी है, तो वह ग़लत हैं। नमाज़ घर में भी पढ़ी जा सकती है, बाहर भी पढ़ी जा सकती है। अलबत्ता बाहर जो लोग ऐसी जगहों पर नमाज़ पढ़ते हैं जिससे दूसरे लोगों को परेशानी और बाधा होती हो तो ऐसी जगहों पर नमाज़ पढ़ना इस्लाम में साफ़ तौर पर हराम क़रार दिया है।
अब बात करते हैं मस्जिद की।

मस्जिद क्यों बनाई गई?

पैग़ंबर मुहम्मद अपने नबी होने के दावे से पहले मक्का में मौजूद एक ग़ार जिसको हिरा कहा जाता है, उसमें अल्लाह की इबादत किया करते थे। और बहुत दिनों तक इसी ग़ार में उन्होंने इबादत की। बेसत यानी नबी होने के दावे के बाद उन्होंने अल्लाह की इबादत के लिए उन्होंने ने खुद के लिए एक विशेष जगह चुनी जहाँ वह अल्लाह की इबादत कर सकें और किसी को कोई दिक्कत न हो। इस जगह का नाम मस्जिदे हराम रखा गया जो आज भी मौजूद है। मस्जिदे हराम में पैग़म्बर के घर वाले भी नमाज़ पढ़ा करते थे। उसके बाद पैग़म्बर के मानने वाले भी इस मस्जिद में पैग़ंबर मुहम्मद के पीछे नमाज़ पढ़ने लगे।
इस्लाम में धारणा का केवल यह मतलब है कि यहां कोई भी मुसलमान पुरे सुकून और शान्ति से नमाज़ पढ़ सकता है यहां न कोई उसको परेशान करने वाला होगा और न ही उससे किसी और को परेशानी होगी।

इस्लाम में औरतों को मस्जिद में जाने से पाबन्दी क्यों है?
इस्लाम के अनुसार मस्जिद एक ऐसी जगह है जहाँ केवल ईश्वर की पूजा की जा सकती है। इस्लाम में ग़ैर मर्दो और औरतों का आपस में इकट्ठा होना अच्छा नहीं समझा जाता है और इसको बुराई का कारण भी माना जाता है। क्यूंकि पैग़ंबर के समय में भी मस्जिद एक ऐसी जगह थी जहाँ केवल मर्द ही जाया करते थे। और नमाज़ के लिए यह शर्त बिलकुल नहीं है कि नमाज़ केवल मस्जिद में ही होगी। उस समय औरतें घरों में ही नमाज़ पढ़ती थीं और उसके लिए वह एक ख़ास जगह बना लेती थीं।
ऐसा नहीं है कि इस्लाम में औरतों को मस्जिद में जाने पर पाबंदी है। बहुत सी जगहों पर औरतें मस्जिद में नमाज़ पढ़ती हैं, जैसे ईरान। मस्जिदे हराम भी औरतें जातीं हैं और वहां नमाज़ भी पढ़ती हैं।
इस्लाम ने औरतों को मस्जिद में जाने से नहीं रोका है बस मस्जिद में मर्द और औरत इकट्ठा नहीं होने चाहिए। इसलिए ऐसी मस्जिदों में जहाँ औरतें भी जातीं हैं उनके लिए अलग जगह का इंतेज़ाम किया जाता है जहाँ मर्द नहीं प्रवेश करते। या फिर औरतों के लिए अलग मस्जिद भी बनाई जा सकती है, जहाँ केवल औरतें ही जा सकती हैं।

Post a Comment

0 Comments