जब से सुप्रीम कोर्ट ने व्यभिचार के 158 साल पुराने क़ानून को असंवैधानिक क़रार दे दिया है तब से इस पर मीडिया में बहस होना शुरू हो गई है। कुछ लोग इसको सही ठहराते हैं तो कुछ लोग इसको समाज के लिए खराब बताते हैं।
सबसे पहले हम समझ लेते हैं कि व्यभिचार है क्या ?
किसी शादीशुदा स्त्री या पुरुष का शादी के बाहर किसी गैर स्त्री या पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध बनाना व्यभिचार में आता था। अगर कोई विवाहित महिला किसी अन्य पुरुष के साथ आपसी रज़ामंदी से शारीरिक सम्बन्ध बनाती है तो उसके पति को यह अधिकार होता है कि वह उस पुरुष के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सके। इस मामले में केवल पुरुष को ही दोषी माना जाता था और उसको पांच साल की सजा होती थी जबकि महिला के ऊपर किसी तरह का कोई केस नहीं दर्ज किया जाता था।
लेकिन अभी यह क़ानून सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय कर दिया है। और 158 साल से चला आ रहा है व्यभिचार का क़ानून अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक क़रार दिया जा चुका है। दरअसल इस क़ानून के ऊपर सुप्रीम कोर्ट में PIL डाली गयी थी जिसमें मांग की गयी थी कि इस क़ानून को निष्पक्ष बनाया जाए। आप को बता दें कि पुराने क़ानून में केवल पुरुष ही दोषी क़रार पाता था और उसी को सज़ा दी जाती थी। इसीलिए पीआईएल डाली गयी और मांग की गयी की इसमें क्यूंकि इस में महिला और पुरुष दोनों भागीदार होते हैं इसलिए केवल पुरुष को ही दोषी न ठहराया जाए बल्कि महिला को भी दोषी माना जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया कि यह क़ानून ही ग़लत है। और इसमें किसी को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। शारीरिक सम्बन्ध व्यक्ति की अपनी निजी इच्छा होती है और क़ानून को इस मामले में दखल देने का अधिकार नहीं है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने शादी के बाहर के समबन्ध को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया।

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